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"Azaadi hokar bhi azaad nahin": Insaan ka aaina - ek aisi kitaab jo aapse sawaal karti hai

"Azaadi hokar bhi azaad nahin": Insaan ka aaina - ek aisi kitaab jo aapse sawaal karti hai

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कभी सोचा है कि सब कुछ होने के बाद भी लाइफ में कुछ मिसिंग क्यों लगता है? ये किताब उसी सवाल का जवाब ढूंढती है। दीपक सिंह तुम्हें एक दोस्त की तरह बताते हैं कि हम खुद ही अपनी लाइफ में इनविजिबल दीवारें बना लेते हैं - डर से, लोग क्या कहेंगे इस टेंशन से, और रिलेशनशिप्स की एक्सपेक्टेशन्स से। छोटी-छोटी कहानियों, सवालों और जर्नलिंग एक्सरसाइज के जरिए ये किताब तुम्हें तुमसे मिलवाती है - ताकि तुम अपनी असली आजादी खुद डिस्कवर कर सको।


"आजादी होकर भी आजाद नहीं" एक ऐसी किताब है जो तुमसे एक सीधा सवाल पूछती है - क्या तुम सच में फ्री हो? दीपक सिंह की ये हिंदी सेल्फ-रिफ्लेक्शन गाइड बताती है कि असली जेल बाहर नहीं होती, हमारे अपने डर, रिश्तों की उम्मीदों और सोसाइटी की सोच के अंदर होती है। 5 चैप्टर्स में जर्नलिंग एक्सरसाइज और रियल-लाइफ स्टोरीज के साथ ये किताब रीडर को खुद से मिलवाती है - ताकि वो अपनी लाइफ की स्टोरी खुद लिख सके।

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